जो था, वो ख्वामखाँ था,
सरकती जमीन पर,अपना मकान था!
एक झूठी उम्मीद पे, झिंदगी कट रही थी
बस, कट ही तो रही थी झिंदगी, मै जी कहाँ रहा था?
ढुँढता रह गया, भीड मे उसे,
वो जाना सा चेहरा, ना जाने कहाँ था!
वो धुंदली सी यादे उसे, कुछ फिकी सी याद होंगी
जब याद भी ना किया उसने, मैं तब भी वहाँ था!
जो आये, वो सब ले गये,
चंद ख्वाईशो मे सिमटा, जो अपना जहान था!
चलो इस बात की तो, तसल्ली है आखिर
जो ले गया कब्र तक, वो उसीका बयान था!
सरकती जमीन पर,अपना मकान था!
एक झूठी उम्मीद पे, झिंदगी कट रही थी
बस, कट ही तो रही थी झिंदगी, मै जी कहाँ रहा था?
ढुँढता रह गया, भीड मे उसे,
वो जाना सा चेहरा, ना जाने कहाँ था!
वो धुंदली सी यादे उसे, कुछ फिकी सी याद होंगी
जब याद भी ना किया उसने, मैं तब भी वहाँ था!
जो आये, वो सब ले गये,
चंद ख्वाईशो मे सिमटा, जो अपना जहान था!
चलो इस बात की तो, तसल्ली है आखिर
जो ले गया कब्र तक, वो उसीका बयान था!
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