मैं और मेरी तन्हाई,
जब साथ होते हैं.
सोचते है दोनो
जब रोते हैं,
इन आँसुओकी टँकी कहाँ है??
कहीं दिमाग मे तो नहीं?
जैसे आसमान से, बारिश का पानी टपकता है.
या फिर है दिल मे कहीं?
जैसे ज॒मीन चिरने पे, पानी निकलता है?
बता दे कोई,
इन आँसुओंकी टँकी कहाँ है??
सोचते हैं हम दोनो,
हमारी खामोशियो से पूछ ले.
शायद... कोई खामोश जवाब मिल जाए!
या पूछ ले हमारी सिसकियों से.
शायद ये अटपटा सवाल सुनकर,
उनके चेहरे खिल जाए!
बस सोचते ही रेहते हैं...
इन आँसुओंकी टँकी कहाँ है??
जब मैं और मेरी तन्हाई,
उस शावर के नीचे,
थोडासा सुकून ढुँढते हैं,
मायूस होकर फिर जब,
वो नल बंद करते है,
एक खयाल फिर दिमाग मे आता है...
'अपने आँसुओंका नल तो,
हमेशा खुला रेहता है!!!
समझ मे ही नही आता...
इन आँसुओंकी टँकी कहाँ है??
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